Monday, December 15, 2008

प्यार है तुमसे..

क्या कभी ऐसा होगा कि तुम आओगे?
देते हो मन पे रोज़ दस्तक
क्या कभी पलकों को छू लोगे
गिरते मोती कहेंगे..
हाँ, प्यार है तुमसे

मुख अब शान्त है, लव्ज़ हैं सोये
पर अब भी जो हवा नाम तुम्हारा ले आये
तो गालों पे सिरहन वो ही होने लगे
और झुकी नज़रें कहें..
हाँ, प्यार है तुम्हीं से

रंगों से मन लगाते हुए
ज़ो बैठूँ रंगोली बनाने
उङते रज कण माथे काला टीका लगायें
आयिना भी कह दे..
हाँ, प्यार मेरा याद है तुम्हें

फूल पसंद हैं हमेशा से
खेलती हूँ बागों में उन्हीं से
पन्खुणीयाँ उडके ठहर जायें बालों पे
हवा भी थम जाये..कहे
हाँ, प्यार ना छूटे तुमसे

सावन की बरसात होने लगे
मौसम फिर खशनुमा होने लगे
नाच उठे मेरा मन ऐसे
आसमान से कहने लगे
हाँ..कभी तो मिलोगे - प्यार है तुम्हीं से

अकेले चलती हूँ पर बिन चाह के
बचती हूँ भीड के रूखे स्पर्श से
और इसी भीड में वो स्पर्श हो हौले से
रोम रोम फिर कहने लगे
हाँ, मन में वोहि - प्यार है उन्हीं से.

4 comments:

उन्मुक्त said...

अच्छी कवितायें हैं। हिन्दी में ही क्यों नहीं लिखते।

Anonymous said...

Very Very beautiful .... I do not have words to praise this. Yeah but would say it reminds me of my past when I use to ask one of my speical ones to show me her poetry. I just cant imagine how beautiful it would have been.

प्रशांत मलिक said...

vaah very romantic poem..

Chhiyaishi said...

thanks :)