Tuesday, December 16, 2008

तुम जाना ना चाहो दूर हमसे

तुम जाना ना चाहो दूर हमसे
तुम्हें दूर ले जायें हमसे नये रिशते

बेबस मन तुम्हारा मेरी ओर खिंचे
और दोश हमारी नज़र को दिये
मजबूर तुम पलट के चले
हाल भी ना जाना रुक के हमसे
तरसते रहे हम एक शब्द को तुम्हारे

महीने और साल बीतते चले गये
वादे झूठ से सच और फिर से झूठे
आदतें बिगाङने को मना करते
फिर नराज़गी भरे प्यार पे तुम्हारे मरते
रातों को - एक ही चाँद को - दो दिल दो देशों से देखते
और रिश्ता नाज़ुक डोर से जोङे रखते

नज़रों से चहरे ओंझल हुए
खयालों पे भी प्रशन चिन्ह लगे
चाँद है डूबा, पहचान भी भूले
याद रखेंगे हम तुम्हें, कसम से
शिक्वा ना कभी कहेंगे किसी से

काश्, कभी सामना हो तुमसे
पर बोलते रुक जायेंगे घबराके
टोक दे तुम्हें कोइ, नराज़ हो तुमपे
ये चाहेंगे नहीं कि हो हमारी वज़ह से
झुटला देंगे रुकी धङकनें
नीचे नज़र करेंगे, मायुस होके

ना तुम जाना चाहो दूर हमसे
तुम्हें दूर नये रिश्ते ले गये हमसे.

2 comments:

Rohit Tripathi said...

रातों को - एक ही चाँद को - दो दिल दो देशों से देखते

bahut sundar.. bahut pyar se likha aapne.. anurag ji ke shabdo mein kahe to... itni sachaiya kaagjo pe na utara kijiye :-)

Anonymous said...

Naye rishte chahe le jaye door ... dil wanhin rehta haine ...
chahe baand do hazar bandishen .. dil bundtha nahin ... na bole saamne na dhadke saamne ... magar dil dhadakta wanhin haine ... chahe jo kur le yeah zamana ... jub dil pukarega to humhe hoga anaa .. aur hum ayenge ...