Monday, December 22, 2008

वो बात नहीं अब जीने में..

ना लिखें कवि इन खूबसूरत लफ्ज़ों को
ना पिरोयें इन्हें शेरो शायिरी में
ना गाया करो ऐ गीतकारों
ना मधुर कुछ गुनगुनाओ इन लम्हों में
ना बादलों तुम गरज बरस जाओ
ना हो एहसास मोहब्बत का सावन में
ना बागों को रोशन किया करो
ना मुस्कुराओ सुर्यमुखी बेरुखी में
ना छेङो मेरी लटें हवाओं
ना ठिठोली करो भीगी पलकों से
ना रंग छूओ मेरे हाथों को
ना उम्मीद करो, भरूँ तुम्हें कागज़ में
ना थाप सुनाओ ढोली सुनो
ना थिरकने को कहो बेबसी में
ना बातें करो चाँद की सखियों
ना ओढूँ चाँदनी लाज में
मीत मुँह मोडे हैं मुझसे
वो बात नहीं अब जीने में..

2 comments:

Rohit Tripathi said...

इक दुआ सी कैसी
कल शाम तेरी याद आई
कि जिंदगी फ़िर से...जिंदगी लगने लगी

Anonymous said...

That was good! You should keep on writing, in hindi with more deepness in other thoughts. Good luck!