Tuesday, January 6, 2009

कुछ शब्द तुम्हारे..

आज इतनी मुश्किल हठ करे हूँ
तुम्हेँ सामने होते भी अनदेखा करे हूँ
भूल से भी शब्द से ज़्यादा बोले तुम्
क्या बून्दें फिर बिखेरने लगी हूँ
खुद से ही मै डर रही हूँ
मन को बहुत समझाकर रखे हूँ
तुम और तुम्हारा ख्याल ना सोचूँ
आज किसी तरह ये निशचय करे हूँ
साये की छुअन भी मेहसूस ना करुँ
बेसब्र होकर तुम्हारा हाल ना पूछ बैठूँ
पर आज एक नये मोड मुडी हूँ
तुम्हारे कहे शब्दों से मन ही मन खुश बहुत हूँ
एक अरसा बीता जब बिन तडप के मुस्कुराये हूँ
आज तुम्हे खुश देख रही हूँ, सुकून पा सकी हूँ
मन की बगीया से गुज़र रही हूँ
हर लम्हें के फूल चुन रही हूँ
अरमानों से उन्हें समेटती जा रही हूँ
लगे ना तुम्हें की कुछ भी भूली हूँ
आसमान में उन्हें बिखेर रही हूँ
शायद इस बद्लाव की आदी होने लगी हूँ
दूरीयों पे समय के पुल बाँध रही हूँ
और उन्हीं पर चलकर संयम की ओर बढी हूँ
मोहब्ब्त के नये मुकाम छू रही हूँ
शब्दहीन फिर भी जाने क्यूँ हूँ
बीते खामोशी के पलों में खोयी हूँ
और आज की खामोशी से फर्क देख रही हूँ
क्या इसे भी तुम्हारे प्यार का करम कहूँ
अनोखा अमर एहसास ले रही हूँ
खुशनसीब वो पल..
और उनमें तुम्हारे साथ मैं हूँ.

1 comment:

vandana said...

un ahsason ko palon mein bahut achche se sanjoya hai