Thursday, January 29, 2009

मूक विचार्

कल शाम का वाकया
कुछ नया नहीं लाया है..

एक गरीब आदमी आके
रेड लाइट पे गाडी के पास रुक जाता है
हाथों में ढेर से गुब्बारे लिये
१० रुपये में सारे खरीदने के लिये कहता है
रोज़ की तरह सब उसे झिडक देते हैं
हम भी गाडी थोडी आगे बढा लेते हैं
रेड लाइट अभी खुली नहीं
आज उसे किस्मत से एक गाडी मिली
धीरे से शीशा खुलता है
कोई सारे गुब्बारे ले लेता है
वो गुब्बारे पकडाता है
और बेहद खुशी से मुस्कुराता है
पैसे लेके
आगे चल पडता है
तभी एक छोटा बच्चा
नंगे पैर वोही गाडी बजाता है
और उसी इन्सान को देखता
दयनीय सी दृश्टि से वोही गुब्बारे माँगता है

मेरा दिल जाने क्या सोचता है
कुछ गहराईयों में डूब जाता है..

1 comment:

उन्मुक्त said...

अच्छी कविता है। हिन्दी में और भी लिखिये।

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